दुनिया की अर्थव्यवस्था तेल पर टिकी है और उस तेल की नब्ज स्ट्रैट ऑफ हॉर्मुज में धड़कती है। अगर ये नब्ज दब गई, तो पूरी दुनिया की रफ्तार थम जाएगी। डोनाल्ड ट्रंप के बेहद करीबी सहयोगियों का मानना है कि जो समुद्र पर कब्जा रखेगा, वही दुनिया पर राज करेगा। ये सिर्फ कोई फिल्मी डायलॉग नहीं है। ये एक सोची-समझी भू-राजनीतिक हकीकत है जिसे आज के दौर में समझना बेहद जरूरी है। हॉर्मुज की नाकाबंदी की बात सिर्फ ईरान को डराने के लिए नहीं की जा रही, बल्कि इसके पीछे अमेरिका की अपनी सुपरपावर वाली इमेज को फिर से जिंदा करने की चाहत छिपी है।
जब हम वैश्विक व्यापार की बात करते हैं, तो नक्शे पर ये छोटा सा जलडमरूमध्य सबसे खतरनाक पॉइंट बन जाता है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य ओमान और ईरान के बीच स्थित है। ये फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। इसकी चौड़ाई महज 21 मील के करीब है, लेकिन इसके जरिए दुनिया का करीब 20 प्रतिशत कच्चा तेल गुजरता है। अगर ट्रंप प्रशासन या उनके सलाहकार हॉर्मुज की नाकाबंदी की वकालत कर रहे हैं, तो वो असल में ईरान की आर्थिक रीढ़ तोड़ने और चीन जैसे देशों की एनर्जी सप्लाई लाइन पर हाथ रखने की कोशिश कर रहे हैं। Read more on a similar topic: this related article.
समुद्र पर नियंत्रण ही असली ताकत है
ट्रंप के करीबियों का ये तर्क कि 'समुद्र जिसने जीता, दुनिया उसकी' दरअसल अल्फ्रेड थायर महान की थ्योरी से प्रेरित लगता है। महान एक अमेरिकी नौसैनिक रणनीतिकार थे जिनका मानना था कि राष्ट्रीय शक्ति का आधार समुद्री प्रभुत्व है। आज के समय में चीन अपनी 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' नीति के जरिए इसी समुद्री रास्ते पर कब्जा करना चाहता है। अमेरिका इसे बर्दाश्त नहीं कर सकता।
हॉर्मुज की नाकाबंदी क्यों जरूरी मानी जा रही है? इसका सीधा संबंध ईरान के बढ़ते रसूख और उसकी परमाणु महत्वाकांक्षाओं से है। अगर अमेरिका या उसके सहयोगी इस रास्ते को कंट्रोल करते हैं, तो वे ईरान के तेल निर्यात को पूरी तरह ठप कर सकते हैं। ईरान की कमाई का सबसे बड़ा जरिया यही तेल है। जब जेब खाली होगी, तो तेहरान के लिए अपने प्रॉक्सी वॉर और मिसाइल प्रोग्राम को फंड करना नामुमकिन हो जाएगा। ये एक तरह का बिना गोली चलाए लड़ा जाने वाला युद्ध है। Additional reporting by The Guardian explores similar perspectives on the subject.
ऊर्जा सुरक्षा और ग्लोबल मार्केट पर असर
हॉर्मुज से हर दिन करीब 21 मिलियन बैरल तेल निकलता है। कल्पना कीजिए कि अगर ये रास्ता एक हफ्ते के लिए भी बंद हो जाए। ग्लोबल मार्केट में तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। $150 या $200 प्रति बैरल का रेट कोई बड़ी बात नहीं होगी। भारत और चीन जैसे देशों के लिए ये स्थिति किसी आपदा से कम नहीं होगी। भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से मंगवाता है।
ट्रंप की टीम का मानना है कि नाकाबंदी की धमकी मात्र से ही दुश्मनों को घुटनों पर लाया जा सकता है। ये "पीस थ्रू स्ट्रेंथ" यानी ताकत के दम पर शांति वाली नीति है। ट्रंप ने अपने पिछले कार्यकाल में भी ईरान पर "मैक्सिमम प्रेशर" की नीति अपनाई थी। अब उनके सलाहकार इसे एक कदम आगे ले जाकर फिजिकल ब्लॉकेड या सख्त समुद्री निगरानी की बात कर रहे हैं। वे जानते हैं कि बीजिंग को अगर कहीं से चोट पहुंचाई जा सकती है, तो वो उसकी एनर्जी सप्लाई लाइन ही है।
ईरान का पलटवार और युद्ध का खतरा
ईरान भी चुप बैठने वालों में से नहीं है। उसने कई बार धमकी दी है कि अगर उसे तेल बेचने से रोका गया, तो वो हॉर्मुज को पूरी तरह बंद कर देगा। ईरान के पास ऐसी छोटी मिसाइलें और ड्रोन्स हैं जो संकरे रास्तों में बड़े जहाजों को निशाना बना सकते हैं। ये एक "स्यूसाइड मिशन" जैसा होगा, लेकिन इससे होने वाला नुकसान पूरी दुनिया को भुगतना पड़ेगा।
हॉर्मुज की चौड़ाई इतनी कम है कि वहां बड़े टैंकरों को गुजरने के लिए फिक्स्ड लेन का इस्तेमाल करना पड़ता है। अगर ईरान वहां माइन्स बिछा देता है, तो पूरी शिपिंग इंडस्ट्री ठप हो जाएगी। इंश्योरेंस प्रीमियम इतने बढ़ जाएंगे कि शिपिंग कंपनियां वहां जाने से कतराएंगी। ट्रंप के करीबियों का कहना है कि इसी खतरे को खत्म करने के लिए अमेरिका को वहां अपनी नौसैनिक उपस्थिति इतनी मजबूत करनी होगी कि ईरान सिर उठाने की हिम्मत न करे।
अमेरिका की नई समुद्री रणनीति क्या है
अमेरिका अब सिर्फ अपनी सीमाओं की रक्षा नहीं कर रहा। वो ये सुनिश्चित करना चाहता है कि वैश्विक व्यापार के चोक पॉइंट्स (Choke Points) पर उसका प्रभाव बना रहे। दक्षिण चीन सागर से लेकर हॉर्मुज तक, एक ही लड़ाई चल रही है। ट्रंप के रणनीतिकारों का मानना है कि पिछले कुछ सालों में अमेरिका ने इन रास्तों पर अपनी पकड़ ढीली की है, जिसका फायदा ईरान और चीन ने उठाया है।
हॉर्मुज की नाकाबंदी का विचार सिर्फ युद्ध भड़काने के लिए नहीं है। ये एक आर्थिक हथियार है। जब ट्रंप कहते हैं कि वे अमेरिका को फिर से महान बनाएंगे, तो उसका मतलब है कि अमेरिका की मर्जी के बिना दुनिया में एक पत्ता भी न हिले। हॉर्मुज इस पूरी बिसात का सबसे महत्वपूर्ण मोहरा है।
भारत के लिए इसके मायने क्या हैं
भारत के लिए ये स्थिति "कुएं और खाई" जैसी है। एक तरफ अमेरिका हमारा रणनीतिक पार्टनर है, दूसरी तरफ ईरान के साथ हमारे पुराने संबंध हैं और हम चाबहार पोर्ट जैसे प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं। अगर हॉर्मुज में तनाव बढ़ता है, तो भारत की इकोनॉमी पर सीधा असर पड़ेगा। तेल महंगा होगा, महंगाई बढ़ेगी और हमारा व्यापार घाटा विकराल रूप ले लेगा।
इसलिए भारत को अपनी खुद की समुद्री ताकत बढ़ानी होगी। हमें सिर्फ दूसरों के भरोसे नहीं रहना चाहिए। हमें अपनी स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) की क्षमता को दोगुना करना होगा ताकि ऐसी किसी भी नाकाबंदी की स्थिति में हमारे पास कम से कम 90 दिनों का बैकअप हो। अभी हम इस मामले में काफी पीछे हैं।
हॉर्मुज की घेराबंदी का वास्तविक क्रियान्वयन
अगर वाकई नाकाबंदी की नौबत आती है, तो ये कैसे होगा? अमेरिकी नेवी अपने कैरियर स्ट्राइक ग्रुप्स को वहां तैनात करेगी। वे हर उस जहाज की जांच करेंगे जो ईरान से बाहर जा रहा है या अंदर आ रहा है। ये अंतरराष्ट्रीय कानूनों के हिसाब से काफी पेचीदा मामला हो सकता है, लेकिन ट्रंप प्रशासन ने हमेशा "अमेरिका फर्स्ट" को कानून से ऊपर रखा है।
ये समझना जरूरी है कि ये केवल ईरान को सजा देने के बारे में नहीं है। ये ग्लोबल लीडरशिप का टेस्ट है। जो देश हॉर्मुज को कंट्रोल करेगा, वो तय करेगा कि किस देश की फैक्ट्रियां चलेंगी और किसका ट्रांसपोर्ट सिस्टम ठप होगा। यही वो ताकत है जिसे ट्रंप के करीबी "दुनिया जीतने" का मंत्र बता रहे हैं।
भविष्य की तैयारियों के लिए कुछ ठोस कदम उठाने होंगे। कच्चे तेल के आयात के लिए हॉर्मुज पर निर्भरता कम करनी होगी। अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे वैकल्पिक बाजारों को तलाशना अब कोई विकल्प नहीं, बल्कि मजबूरी है। इसके अलावा, रिन्यूएबल एनर्जी की तरफ ट्रांजिशन को तेज करना ही एकमात्र लॉन्ग टर्म समाधान है। जब तक हम तेल के लिए इन संकरे समुद्री रास्तों के मोहताज रहेंगे, हमारी संप्रभुता हमेशा दांव पर लगी रहेगी। समुद्री सुरक्षा के लिए क्वॉड (QUAD) जैसे समूहों को और अधिक सक्रिय होना पड़ेगा ताकि किसी एक देश की दादागिरी न चले।