पश्चिम एशिया में तनाव एक बार फिर चरम पर है। अमेरिका और ईरान के बीच बयानों की जंग अब बेहद निजी और ऐतिहासिक आरोपों तक पहुंच गई है। हाल ही में अमेरिकी खुफिया एजेंसियों और सैन्य अधिकारियों ने दावा किया कि ईरान ने अपने तटीय और रणनीतिक इलाकों में गुप्त क्रूज मिसाइल बेस तैयार किए हैं। इन अड्डों से खाड़ी क्षेत्र और अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों को निशाना बनाया जा सकता है। अमेरिका का यह दावा सामने आते ही ईरान आगबबूला हो गया। उसने न केवल अमेरिकी दावों को खारिज किया बल्कि जवाबी हमला करते हुए एक ऐसा पुराना जख्म कुरेद दिया जिसने दोनों देशों के कड़वे इतिहास को एक बार फिर दुनिया के सामने ला दिया है।
ईरान ने अमेरिकी आरोपों पर भड़कते हुए सीधे तौर पर मिनाब स्कूल की उस भीषण घटना का जिक्र किया जिसमें 170 मासूम बच्चों की जान चली गई थी। ईरान का कहना है कि जो देश खुद मासूमों के कत्लेआम के लिए जिम्मेदार है, उसे दूसरों पर उंगली उठाने का कोई हक नहीं है। यह बयान सिर्फ एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं है। यह ईरान की उस गहरी नाराजगी और दर्द को दिखाता है जो वह दशकों से अमेरिका के खिलाफ पाले हुए है। इस टकराव ने साफ कर दिया है कि दोनों देशों के बीच का विवाद सिर्फ आज की सैटेलाइट तस्वीरों या मिसाइल टेक्नोलॉजी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें इतिहास के खून से सने पन्नों में धंसी हैं।
अमेरिकी क्रूज मिसाइल बेस का दावा और उसकी हकीकत
अमेरिकी रक्षा मंत्रालय यानी पेंटागन ने हालिया रिपोर्ट्स में सैटेलाइट तस्वीरों का हवाला देकर कहा कि ईरान ने खाड़ी के तटीय इलाकों और मिनाब जैसे क्षेत्रों के पास अपनी अंडरग्राउंड मिसाइल क्षमताओं को काफी बढ़ा लिया है। वाशिंगटन का मानना है कि ये क्रूज मिसाइल बेस न केवल अमेरिकी नौसेना के जहाजों के लिए खतरा हैं बल्कि वैश्विक तेल आपूर्ति मार्ग को भी ठप कर सकते हैं।
ईरान इस नैरेटिव को पूरी तरह खारिज करता है। तेहरान का रुख हमेशा से साफ रहा है। उसका कहना है कि उसका मिसाइल प्रोग्राम पूरी तरह से रक्षात्मक है। ईरान के सैन्य कमांडरों का तर्क है कि जब आपके चारों तरफ अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हों, तो अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए मजबूत डिफेंस सिस्टम तैयार करना कोई गुनाह नहीं है। ईरान इसे अपनी संप्रभुता पर हमला मानता है कि अमेरिका हजारों मील दूर बैठकर यह तय करना चाहता है कि ईरान अपनी धरती पर क्या बना सकता है और क्या नहीं।
मिनाब स्कूल की त्रासदी और ईरान का तीखा पलटवार
जब अमेरिका ने ईरान की घेराबंदी शुरू की, तो ईरान ने अपनी प्रतिक्रिया के लिए मिनाब शहर को चुना। ईरान के दक्षिणी हिस्से में स्थित मिनाब केवल एक रणनीतिक इलाका नहीं है, बल्कि यह ईरानी चेतना में एक गहरे घाव की तरह दर्ज है। ईरान ने सीधे तौर पर अमेरिका को याद दिलाया कि कैसे मिनाब के एक स्कूल पर हुए हमले में 170 बच्चों की मौत हो गई थी और ईरान इस त्रासदी का मुख्य जिम्मेदार अमेरिका की नीतियों और उसके हथियारों को मानता है।
यह संदर्भ ईरान-इराक युद्ध (1980-1988) के दौर से जुड़ता है। उस दौरान अमेरिका ने सद्दाम हुसैन की इराकी सरकार को बड़े पैमाने पर खुफिया जानकारी, वित्तीय मदद और घातक हथियार मुहैया कराए थे। ईरान का आरोप है कि इराकी लड़ाकू विमानों ने जिन अमेरिकी गाइडेड बमों और मिसाइलों से ईरानी शहरों, अस्पतालों और मिनाब के स्कूलों को निशाना बनाया, वे सब पश्चिमी देशों की शह पर हुआ था। ईरान के विदेश मंत्रालय ने साफ शब्दों में कहा कि 170 बच्चों के खून से सने हाथ वाले हमें सुरक्षा पर ज्ञान न दें।
क्यों पुराना इतिहास आज भी तय कर रहा है दोनों देशों का भविष्य
यह समझना जरूरी है कि ईरान हर अमेरिकी आरोप के जवाब में इतिहास को सामने क्यों ले आता है। यह कोई संयोग नहीं है। ईरान की पूरी विदेश नीति और उसकी सुरक्षा रणनीति इसी ऐतिहासिक अविश्वास पर टिकी है। 1953 में तख्तापलट के जरिए ईरान के लोकतांत्रिक प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेघ को हटाने से लेकर ईरान-इराक युद्ध में सद्दाम हुसैन की मदद करने तक, ईरान अमेरिका को एक अविश्वसनीय और आक्रामक ताकत के रूप में देखता है।
जब अमेरिका ईरान के क्रूज मिसाइलों को दुनिया के लिए खतरा बताता है, तो ईरान अपने नागरिकों को याद दिलाता है कि अगर आज उनके पास मजबूत मिसाइलें नहीं होंगी, तो मिनाब स्कूल जैसी घटनाएं दोबारा दोहराई जा सकती हैं। यह नैरेटिव ईरान के भीतर घरेलू समर्थन जुटाने में भी बेहद मददगार साबित होता है। सरकार इसके जरिए जनता को यह समझाने में कामयाब रहती है कि आर्थिक प्रतिबंधों और मुश्किलों के बावजूद मिसाइल प्रोग्राम पर पैसा खर्च करना क्यों जरूरी है।
क्या वाकई युद्ध की तरफ बढ़ रहा है खाड़ी क्षेत्र
इस तीखी बयानबाजी के बीच असली चिंता यह है कि क्या यह विवाद केवल बयानों तक सीमित रहेगा या फिर बात हथियारों तक पहुंच जाएगी। खाड़ी क्षेत्र में तनाव का बढ़ना पूरी दुनिया के लिए खतरे की घंटी है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे संवेदनशील जलमार्ग से दुनिया का एक-तिहाई तेल गुजरता है। अगर यहां जरा सी भी चिंगारी भड़की, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था को संभलने का मौका नहीं मिलेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान अपने मिसाइल अड्डों को छुपाने के बजाय जानबूझकर उनका प्रदर्शन करता है ताकि अमेरिका या उसके सहयोगी देश हमला करने से पहले सौ बार सोचें। इसे मिलिट्री की भाषा में डेटरेंस यानी निवारक क्षमता कहते हैं। दूसरी तरफ, अमेरिका अपनी इस रणनीति पर अड़ा है कि ईरान को इस क्षेत्र में इतना ताकतवर न होने दिया जाए कि वह इजरायल या खाड़ी के अन्य मित्र देशों के लिए सीधा खतरा बन जाए।
इस विवाद को सुलझाने के लिए मौजूदा अंतरराष्ट्रीय मंच पूरी तरह नाकाम साबित हुए हैं। प्रतिबंधों ने ईरान की अर्थव्यवस्था को चोट तो पहुंचाई है, लेकिन उसके हौसले और सैन्य तकनीक को कमजोर करने में वे विफल रहे हैं। अब रास्ता केवल यही बचता है कि दोनों पक्ष अपनी पुरानी कड़वाहट को पीछे छोड़कर टेबल पर आएं, हालांकि मौजूदा हालातों को देखकर इसकी उम्मीद न के बराबर लगती है।
अगर आप इस पूरे घटनाक्रम को करीब से समझना चाहते हैं, तो केवल मौजूदा बयानों को न देखें। पश्चिम एशिया की राजनीति को समझने का सबसे सही तरीका यह है कि आप वहां के इतिहास को पढ़ें। जब तक अमेरिका ईरान की ऐतिहासिक चिंताओं और ईरान अमेरिका की सुरक्षा संबंधी आपत्तियों को गंभीरता से नहीं लेगा, तब तक मिनाब के शहीदों और क्रूज मिसाइलों के बीच की यह जंग ऐसे ही चलती रहेगी। आपको इस मुद्दे पर वैश्विक कूटनीति के स्वतंत्र विश्लेषणों और ऐतिहासिक दस्तावेजों को खंगालना चाहिए ताकि आप किसी एक पक्ष के प्रोपेगैंडा में फंसे बिना पूरी सच्चाई को खुद समझ सकें।